Top 4 Gajal with One Sher:बहादुरशाह जफ़र-प्रसिद्ध शायर

May 05, 2019

Top 4 Gajal with One Sher:बहादुरशाह जफ़र

Top 4 Gajal with One Sher:बहादुरशाह जफ़र,1857
Top 4 Gajal with One Sher:बहादुरशाह जफ़र


मुगलवंश के अन्तिम शासक बहादुर शाह जफर केवल शासक ही नहीं एक अच्छे शायर भी थे। मिर्जांगालिब इनके दरबार में रहे बहादुर शाह स्वंय मशहूर शायर इब्राहीम जौक के शार्गिंद थे। जफर ने अपने समय में बहुत सारी गजले लिखी लेकिन उनकी बहुत सारी गजले
1857 की क्रांति के उथल पुथल में नष्ट हो गयी उनकी लिखी ये पंक्तियां काफी मशहूर है। Top 4 Gajal with One Sher:बहादुरशाह जफ़र

हिंदिओ में बू रहेगी जब तलक ईमान की
तख्त-ए-लंदन तक चलेगी तेग हिन्दुस्तान की।।
Top 4 Gajal with One Sher:बहादुरशाह जफ़र,1857
Top 4 Gajal with One Sher:बहादुरशाह जफ़र

कंहू तो किस से कंहू

भरी है दिल मे जो हसरत कंहू तो किस से कंहू
सुने है कौन मुसीबत कंहू तो किस से कंहू
जो तू हो साफ तो कुछ में भी साफ तुझ से कंहू
तिरे है दिल में कुदूरत कंहू तो किस से कंहू
दिल उसको आप दिया आप ही पशेमां हूं
कि सच है अपनी नदामत कंहू तो किस से कंहू
कंहू मैं जिस से उसे होवे सुनते ही वहशत
फिर अपना किस्सा-ए-वहशत कंहू तो किस से कंहूं
जो दोस्त हो तो कंहू तुझ से दोस्ती की बात
तुझे तो मुझसे अदावत कंहू तो किस से कंहू
न मुझ को कहने की  ताकत कंहू तो क्या अहवाल
न उसको सुनने की फुर्सत कंहू तो किस से कंहू
किसी को देखता इतनी नहीं हकीकत में
जफर’ मैं अपनी हकीकत कंहू तो किस से कंहू

 Top 4 Gajal with One Sher:बहादुरशाह जफ़र

 मुश्किलें कभी ऐसी ना थी
बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तिरी महफिल कभी ऐसी तो न थी
ले गया छीन के कौन आज तिरा सब्र-ओ-करार
बे-करारी तुझे ऐ दिल कभी ऐसी तो न थी
उस की आंखों ने खुदा जाने किया क्या जादू
कि तबीअत मिरी माइल कभी ऐसी तो न थी
चश्म-ए-कातिल मिरी दुश्मन थी हमेशा लेकिन
जैसी अब हो गई कातिल कभी ऐसी तो न थी
क्या सबब तू जो बिगड़ता है जफर’ से हर बार
खू तिरी हूर-शमाइल कभी ऐसी तो न थी

 Top 4 Gajal with One Sher:बहादुरशाह जफ़र

हम ये तो नही कहते
हम ये तो नही कहते कि गम कह नहीं सकते
पर जो सबब-ए-गम है वो हम कह नहीं सकते
हम देखते है तुम में खुदा जाने बूतो क्या
इस भेद को अल्लाह की कसम कह नहीं सकते
रुस्वा-ए-जहां करता है रो रो के हमें तू
हम तुझे कुछ ऐ दीद-ए-नम कह नहीं सकते
जब कहते है कुछ बात रुकावट की तिरे हम
रूक जाता है ये सीने में दम कह नहीं सकते
 जो हम पे शब-ए-हिज्र में उस माह-ए-लका के
गुजरे  हैं जफर’ रंज ओ अलम कह नहीं सकते
 जिगर के टुकड़े हुए जल के दिल कबाब हुआ
 जिगर के टुकड़े हुए जल के दिल कबाब हुआ
ये इश्क जान को मेरे कोई अजाब हुआ
किया जो कत्ल मुझे तुमने खूब काम किया
कि मैं अजाब से छुटा तुम्हें सवाब हुआ
कभी तो शेफ्ता उस ने कहा कभी शैदा
गरज कि रोज नया इक मुझे खिताब हुआ
गली गली तिरी खातिर फिरा ब-चश्म-ए-पुरा आब
लगा के तुझ से दिल अपना बहुत खराब हुआ
मंगाई थी तिरी तस्वीर दिल की तस्कीं की
मुझे तो देखते ही और इज्तिराब हुआ
सितम तुम्हारे बहुत और दिन हिसाब का एक
मुझे है सोच ये ही किस तरह हिसाब हुआ
जफर’ बदल के रदीफ और तू गजल वो सुना

कि जिस का तुझ से हर  एक शेर इंतिखाब हुआ

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