2019 समाज पर कविता: दूषित मानसिकता - Ankhuwa Hindi

April 04, 2019

निर्भीक हो पग

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कल्पनाओं के सागर में,
चिंतन की तरणी लेकर,
यथार्थ खोजता हूँ।
क्यों अन्य के निर्माणीत पथ?
अपने पग रखूँ ,
क्यों ना ध्वस्त करू ?
खंडहर हो चुके,
रूढ़ियो-परंपराओं के राजमहल को।
नव-आधार शिला रखूँ ,
वर्तमान के कपाल पर।
सात समन्दर चाहे जल लान पड़े
अग्नि कुंड चाहे स्वंय बनाना पड़े।।
यज्ञ करूँगा,
हुताशन को आहुति दूँगा।
अपने प्राणों की,
लक्ष्मण रेखा क्यों ना पार करू?
रावण के डर से।
उसके सर्वनाश का
यही विकल्प है।
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तभी करेंगे विचरण,
नभ के आखिरी छोर तक।
तभी शान्ति मिलेगी मुझकों,
सुकुमारी, गृह-प्यारी,
निर्भीक हो, पग रखे
रति के उच्छावस पर।

गांव की आधुनिक नारी




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